
पंजाब में कुछ जगह खालिस्तानियों द्वारा रेफरेंडम 2020 के पोस्टर लगाए गए हैं।
अधिकतर लोग सोचते हैं कि खालिस्तानी विचारधारा भिंडरावाला से शुरू हुई है जो कि सरासर गलत है, दरअसल इसके बीज तो 1920 – 25 में “गुरुद्वारा सुधार लहर” या कहें कि “अकाली मूवमेंट” में ही बो दिए गए थे।
इस मूवमेंट में हुआ ये था कि “निर्मले” और “उदासियों” को गुरुद्वारों से निकाल दिया था और उनके हाथों से प्रबंधन छीन लिया गया था, निर्मले और उदासी वो हैं जिन्होंने सिक्खी का भरपूर प्रचार किया और आज भी कर रहे हैं, और इन्हें निकाल दिया गया, और इसे सुधार का नाम दिया गया।
अब ये जान लें कि निर्मले और उदासी हैं कौन?
गुरु नानक देव जी के बड़े पुत्र बाबा श्रीचंद्र जी ने उदासीन पँथ चलाया, ये सन्यासियों का पँथ है, इस पँथ के अनुयायी हिन्दू देवी देवताओं में विश्वास करते हैं, इस पँथ ने गुरुबाणी का पाठ और प्रचार करना शुरू किया! छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद राय जी के पुत्र बाबा गुरदित्ता जी, बाबा श्रीचंद्र जी की गद्दी पर विराजमान हुए, उदासीन पँथ के अनुयायी भगवे कपड़े पहनते हैं और वेदों में श्रद्धा रखते हैं, बहुत से गुरुद्वारों का प्रबंधन इनके हाथ में था।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने निर्मल पँथ चलाया, गुरु गोबिंद सिंह जी ने इन्हें संस्कृत सीखने और वेदों, शास्त्रों का अध्यन करने का आदेश दिया, इन लोगों ने भी सिक्खी का खूब प्रचार किया, ये लोग भी भगवे कपड़े पहनते हैं, वेदों – शास्त्रों का अध्यन करते हैं और गुरुबाणी का प्रचार प्रसार करते हैं, इनके हाथ में भी बहुत से गुरुद्वारों का प्रबंधन था।
लगभग हर गुरुद्वारे का प्रबंधन निर्मले और उदासियों के हाथ में था लेकिन अकाली मूवमेंट में इनके हाथों से प्रबंधन छीन लिया गया।
जब तक प्रबंधन और प्रचार इनके हाथ में था तब तक हर सिक्ख स्वयं को “हिन्दू” समझता था, इनके समय में हर गुरुद्वारे में से वेदों के मंत्रों की आवाज आया करती थी, ये गुरुबाणी की व्याख्या वेदों शास्त्रों के उदाहरण दे कर करते थे, और ये सिक्ख पँथ को वैदिक पँथ कहते थे।
जब तक ये रहते तब तक हर सिक्ख स्वयं को सनातनी ही मानता रहता, सो अंग्रेजों ने ननकाना साहिब के महंत को खरीद लिया, फिर इतिहास बहुत लंबा है, आप यूँ समझ लीजिए कि इस एक महंत के कारण हर निर्मले उदासी को पँथ से निकाल दिया गया।
अब तो सिक्ख इतिहास में पढ़ाया जाता है कि सिक्ख युद्ध मे व्यस्त रहते थे जिसका लाभ उठाकर हिन्दू पुजारियों ने गुरुद्वारों पर कब्जा कर लिया था, जिसका कोई आधार नही है।
अगर ये निर्मले और उदासी फिर से गुरुद्वारा प्रबंधन और प्रचारक कमेटी में आ जाएं तो खालिस्तान नाम की समस्या से निजात मिल सकती है।
मास्टर तारा सिंह
मास्टर तारासिंह ने सन् 1921 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया, पर सन् 1928 की भारतीय सुधारों संबंधी नेह डिग्री कमेटी की रिपोर्ट का इस आधार पर विरोध किया कि उसमें पंजाब विधानसंभा में सिक्खों को 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया था। अकाली दल ने कांग्रेस से अपना संबंध विच्छेद कर लिया। 1930 में पूर्ण स्वराज्य का संग्राम प्रारंभ होने पर मास्टर तारासिंह तटस्थ रहे और द्वितीय महायुद्ध में अंग्रेजों की सहायता की। सन् 1946 के महानिर्वाचन में मास्टर तारासिंह द्वारा संगठित “पथिक” दल अखंड पंजाब की विधानसभा में सिक्खों को निर्धारित 33 स्थानों में से 20 स्थानों पर विजयी हुआ। मास्टर जी ने सिखिस्तान की स्थापना के अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए श्री जिन्ना से समझौता किया। पंजाब में लीग का मंत्रिमंडल बनाने तथा पाकिस्तान के निर्माण का आधार ढूँढ़ने में उनकी सहायता की। लेकिन राजनीति के चतुर खिलाड़ी जिन्ना से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। भारत विभाजन की घोषणा के बाद अवसर से लाभ उठाने की मास्टर तारासिंह की योजना के अंतर्गत ही देश में दंगों की शुरुआत अमृतसर से हुई, पर मास्टर जी का यह प्रयास भी विफल रहा। लेकिन उन्होंने हार न मानी; सतत संघर्ष उनके जीवन का मूलमंत्र था।
मास्टर जी ने संविधानपरिषद् में सिक्खों के सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को कायम रखने, भाषासूची में गुरुमुखी लिपि में पंजाब को स्थान देने तथा सिक्खों को हरिजनों की भाँति विशेष सुविधाएँ देने पर बल दिया और सरदार पटेल से आश्वासन प्राप्त करने में सफल हुए। इस प्रकार संविधानपरिषद् द्वारा भी सिक्ख संप्रदाय के पृथक् अस्तित्व पर मुहर लगवा दी तथा सिक्खों को विशेष सुविधाओं की व्यवस्था कराकर निर्धन तथा दलित हिंदुओं के धर्मपरिवर्तन द्वारा सिक्ख संप्रदाय के त्वरित प्रसार का मार्ग उन्मुक्त कर दिया। तारासिंह इसे सिक्ख राज्य की स्थापना का आधार मानते थे। सन् 1952 के महानिर्वाचन में कांग्रेस से चुनाव समझौते के समय वे कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा पृथक् पंजाबी भाषी प्रदेश के निर्माण तथा पंजाबी विश्वविद्यालय की स्थापना का निर्णय कराने में सफल हुए।
मास्टर तारासिंह ने प्रथम महायुद्ध के समय राजनीति में प्रवेश किया। उन्होंने सरकार की सहायता से सिक्खपंथ को बृहत् हिंदू समाज से पृथक् करने के सरदार उज्जवलसिंह मजीठिया के प्रयास में हर संभव योग दिया। सरकार को प्रसन्न करने के लिए सेना में अधिकाधिक सिक्खों को भर्ती होने के लिए प्रेरित किया। सिक्खों को इस राजभक्ति का पुरस्कार मिला। सब रेलवे स्टेशनों का नाम गुरुमुखी में लिखा जाना स्वीकार किया गया और सिक्खों को भी मुसलमानों की भाँति इंडिया ऐक्ट 1919 में पृथक् सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया। महायुद्ध के बाद मास्टर जी ने सिक्ख राजनीति को कांग्रेस के साथ संबद्ध किया और सिक्ख गुरुद्वारों और धार्मिक स्थलों का प्रबंध हिंदू मठाधीशों और हिंदू पुजारियों के हाथ से छीनकर उनपर अधिकार कर लिया। इससे अकाली दल की शक्ति में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। मास्टर तारासिंह शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी के प्रथम महामंत्री चुने गए। ग्रंथियों की नियुक्ति उनके हाथ में आ गई। इनकी सहायता से अकालियों का आंतकपूर्ण प्रभाव संपूर्ण पंजाब में छा गया। मास्टर तारासिंह बाद में कई बार शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष चुने गए।